जख़्म दिल के हरे हरे से रहते हैं
सभी अरमान भरे-भरे से रहते हैं
शराफ़त ही होता है जिन लोगों का ईमां
न जाने क्यों डरे-डरे से रहते हैं
बड़ा मुश्किल है सह पाना सच्चे इंसां को
ऐसे आदमी से लोग परे-परे रहते हैं
बस गये हैं इतने ग़म दिल में
इसलिये तो हम भरे-भरे से रहते हैं
मिल ना पाई कोई ऐसी बस्ती हमें
जहां पर बाशिंदे खरे-खरे से रहते हैं
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